शिर्डी के साँई बाबा जी के दर्शनों का सीधा प्रसारण....

Sunday, January 24, 2016

हे साईं दीन दयाल मेरे घर आ जाओ

ॐ सांई राम




साईं सुन लो रे, मेरी पुकार
मेरे घर आ जाओ
हे साईं दीन दयाल
मेरे घर आ जाओ


साईं तुम्ही हो मन की धड़कन
रग रग में तेरा ही जीवन
दर्शन भर से मिटती उलझन
मेरे साईं दया निधान
मेरे घर आ जाओ
हे साईं दीन दयाल
मेरे घर आ जाओ
साईं सुन लो रे, मेरी पुकार
मेरे घर आ जाओ



मै तो दासी साईं तुम्हारी
पल पल तुमरी राह निहारी
मस्तक पर है चरण रज धारी
मेरा कुछ तो करो ख़याल
हे साईं दीन दयाल
मेरे घर आ जाओ
साईं सुन लो रे, मेरी पुकार
मेरे घर आ जाओ



नैनों में तुम रहो समाये
जिह्वा तुमरे ही गुण गाये
मन हर पल तुमको ही मनाये
मान जाओ किरपा धार
मेरे घर आ जाओ
हे साईं दीन दयाल
मेरे घर आ जाओ
साईं सुन लो रे, मेरी पुकार
मेरे घर आ जाओ

यह सौगात आप सब की  नज़र
साईं की बेटी -  रविंदर जी

Thursday, November 21, 2013

महर्षि वाल्मीकि जी



ॐ साँई राम जी













महर्षि वाल्मीकि जी



महर्षि वाल्मीकि का जन्म त्रैता युग में अस्सू पूर्णमाशी को एक श्रेष्ठ घराने में हुआ| आप अपने आरम्भिक जीवन में बड़ी तपस्वी एवं भजनीक थे| लेकिन एक राजघराने में पैदा होने के कारण आप शस्त्र विद्या में भी काफी निपुण थे|

आप जी के नाम के बारे ग्रंथों में लिखा है कि आप जंगल में जाकर कई साल तपस्या करते रहे| इस तरह तप करते हुए कई वर्ष बीत गए| आपके शरीर पर मिट्टी दीमक के घर की तरह उमड़ आई थी| संस्कृत भाषा में दीमक के घरों को 'वाल्मीकि' कहा जाता है| जब आप तपस्या करते हुए मिट्टी के ढेर में से उठे तो सारे लोग आपको वाल्मीकि कहने लगे| आपका बचपन का नाम कुछ और था, जिस बारे कोई जानकारी पता नहीं लगी|

भारत में संस्कृत के आप पहले उच्चकोटि के विद्वान हुए हैं| आप जी को ब्रह्मा का पहला अवतार माना जाता है| प्रभु की भक्ति एवं यशगान से आपको दिव्यदृष्टि प्राप्त हुई थी और आप वर्तमान, भूतकाल तथा भविष्यकाल बारे साब कुछ जानते थे| श्री राम चन्द्र जी के जीवन के बारे आप जी को पहले ही ज्ञान हो गया था| इसलिए आप जी ने श्री राम चन्द्र जी के जीवन के बारे पहले 'रामायण' नामक एक महा ग्रंथ संस्कृत में लिख दिया था| बाद में जितनी भी रामायण अन्य कवियों तथा ऋषियों द्वारा लिखी गई है, वह सब इसी 'रामायण' को आधार मानकर लिखी गई हैं|

जब महर्षि वालिमिकी को 'रामायण' की कहानी का पूर्ण ज्ञान हो गया तो आप जी ने एक दिन अपने एक शिष्य को बुलाया तथा तमसा नदी के किनारे पर पहुंच गए| इस सुन्दर नदी पर वह पहली बार आए थे| वह नदी के तट पर चलते-चलते बहुत दूर निकल गए| अंत में वह नदी के एक तट पर जाकर रुक गए|

नदी का वह किनारा बड़ा सुन्दर तथा हरा-भरा था| नदी का सुन्दर किनारा और निर्मल जल देखकर वालिमिकी जी बहुत प्रसन्न हुए| निर्मल जल को देखकर वह नदी पर स्नान करने गए| स्नान करते-करते वह उस जंगल में पहुंच गए जहां एक पेड़ पर बैठे चकवा चकवी प्रेम रस में डूबे हुए थे|

चकवा चकवी प्रेम करते बड़े प्रसन्न दिखाई दे रहे थे| वाल्मीकि जी अभी उनकी तरफ देख ही रही थी कि एक शिकारी उधर आ निकला|

उसने चकवे की हत्या कर दी| अपने प्यारे पति को तड़पता देखकर चकवी बहुत दुखी हुई तथा विलाप करने लग गई| शिकारी के निंदनीय कार्य को देखकर महर्षि वाल्मीकि बहुत क्रोधित हो गए| उन्होंने एक श्लोक संस्कृत में उच्चारण किया जिसका भाव था, 'हे शिकारी तूने जो प्रेम लीला कर रहे चकवे के प्राण लिए हैं इस कारण तेरी शीघ्र ही मृत्यु हो जाएगी तथा तेरी पत्नी भी इसी तरह दुखी होगी|'

वाल्मीकि जी के मुख से यह वचन स्वाभाविक ही निकल गए| फिर वह सोचने लगे कि मैं पक्षियों का दुःख देखकर यह सारा श्राप युक्त वचन क्यों कर बैठा| लेकिन जब अपने कहे हुए उत्तम तथा अलंकारक श्लोक की तरफ देखा तो बड़े प्रसन्न हुए| वह उस श्लोक को दोबारा गाने लगे| फिर उन्होंने अपने शिष्य भारद्वाज को कथन किया कि वह इस श्लोक को कंठस्थ कर ले ताकि इसे भूल न जाए| शिष्य भारद्वाज ने उस समय यह श्लोक कंठस्थ कर लिया|

इस तरह मासूम पक्षी की मृत्यु ने महर्षि वाल्मीकि के मन पर वेरागमयी प्रभाव डाला| पक्षी के तड़पने, मरने तथा मरने से पहले प्रेम लीला की झांकी महर्षि की आंखों से ओझल नहीं हो रही थी| इस विचार में डूबे हुए वाल्मीकि अपने आश्रम में आ पहुंचे|

लेकिन आश्रम में आकर भी आप उस श्लोक को मुंह में गुणगुनाने लगे| आप जी को दिव्यदृष्टि द्वारा जो श्री रामचन्द्र जी का जीवन चरित्र ज्ञात हुआ था, आप जी ने मन बनाया कि क्यों न उस श्लोक की धारणा में श्री रामचन्द्र जी का जीवन चरित्र लिख दिया जाए|

यह विचार बनाकर महर्षि वाल्मीकि जी सुन्दर ज्ञानवर्धक श्लोकों वाली 'रामायण' लिखने लगे| ऊंचे ख्यालों वाले शब्द, पिंगल तथा व्याकरण एवं नियम-उपनियम अपने आप उनके पास इकट्ठे होने लगे| फिर महर्षि वाल्मीकि जी जब अन्तर-ध्यान हुए तो श्री रामचन्द्र, लक्ष्मण, सीता, दशरथ, कैकेयी, माता कौशल्या तथा हनुमान आदि मुख्य पात्रों के बारे सारे छोटे से छोटे हाल का भी सूक्ष्म ज्ञान हो गया| यहां तक कि श्री रामचन्द्र जी का हंसना, बोलना, मुस्कराना, तथा खेलना भी कानों में सुनाई देने लगा| आंखें उनके वास्तविक स्वरूप को देखने लगीं| सीता तथा श्री रामचन्द्र जी के जो संवाद वन में होते रहे महर्षि जी को उनका भी ज्ञान होता गया| जो भी घटनाएं घटित हुई थीं, वे याद आ गईं|

फिर महर्षि वाल्मीकि जी ने अपने शिष्यों के पास से बेअंत भोज पत्र मंगवाए तथा उनके ऊपर लिखना शुरू कर दिया जो बहुत मनोहर हैं तथा सम्पूर्ण रचना को सात कांडों सात सौ पैंतालीस सरगों तथा चौबीस हजार श्लोकों में विभक्त किया गया है|

जब महर्षि वाल्मीकि रामायण का मुख्य भाग लिख चुके थे तो सीता माता श्री रामचन्द्र की ओर से वनवास दिए जाने के कारण उनके आश्रम में आई| आप जी ने अपने सेवकों को सीता माता को पूरे आदर-सत्कार से रखने के लिए कहा| कुछ समय के बाद सीता माता के गर्भ से दो पुत्रों ने जन्म लिया| उन पुत्रों के नाम लव तथा कुश रखे गए| महर्षि ने उन बच्चों के पालन-पोषण का विशेष ध्यान रखा| अल्प आयु में ही उनकी शिक्षा शुरू कर दी| महर्षि वाल्मीकि स्वयं लव एवं कुश को पढ़ाते थे| बच्चों को संस्कृत विद्या के साथ-साथ संगीत तथा शस्त्र विद्या भी दी जाती थी| वाल्मीकि लव एवं कुश को रामायण भी पढ़ाने लगे|

वह दोनों बालक शीघ्र ही संस्कृत के विद्वान, संगीत के सम्राट बन गए| वे शस्त्र विद्या में भी काफी निपुण हो गए| महर्षि ने सोचा कि इन बालकों के द्वारा राम कथा को जगत में प्रचारित किया जाए| उन बालकों को वाल्मीकि ने राम कथा मौखिक याद करने के लिए कहा| बालकों लव कुश ने कुछ समय में ही चौबीस हजार श्लोक कंठस्थ कर लिए| वह अपने मीठे गले तथा सुरीली सुर में रामायण गाने लगे| उन्होंने दो सात सुरों वाली वीणाएं लीं तथा राम कथा का गुणगान करने लगे|

जब वह गायन कला में परिपूर्ण हो गए तो वाल्मीकि जी ने उनको आज्ञा दी की वह दूर-दूर जाकर उस उच्च तथा कल्याणकारी काव्य का प्रचार करें| दोनों राजकुमार जो श्रीराम चन्द्र जी के समान सुन्दर, विद्वान तथा बलशाली थे, ऋषियों, साधुओं तथा जनसमूह में जाकर रामकथा का गायन किया करते थे| उनके सुरीले गान ने काव्य को ओर ऊंचा कर दिया| जब वह गाते तो श्रोता बहुत प्रसन्न एवं वैरागमयी हो जाते| सब के नेत्रों में श्रद्धा, हमदर्दी तथा भक्ति के नीर बहने लग जाते| प्रत्येक नर-नारी उनकी उपमा करके बालकों लव कुश के पीछे-पीछे चल पड़ते| लव कुश केवल उस काव्य का गायन ही नहीं कर रहे थे बल्कि एक नया संदेश भी दे रहे थे| भूतकाल की घटनाएं वर्तमान काल की घटनाएं प्रतीत हो रही थीं| लव तथा कुश रामकथा का गायन करके वापिस महर्षि वाल्मीकि जी के आश्रम में आ जाया करते थे| वह अपनी माता सीता जी का बहुत सत्कार करते थे|

उन दिनों में ही श्री रामचन्द्र जी ने चक्रवर्ती राजा बनने के लिए अश्वमेध यज्ञ करने का फैसला किया| उन्होंने यज्ञ के लिए एक घोड़ा छोड़ा तथा ऐलान किया कि जो इस घोड़े को पकड़ेगा, उसे लक्ष्मण के साथ युद्ध करना होगा| लक्ष्मण एक बड़ी सेना लेकर घोड़े के पीछे-पीछे जा रहा था| जब यह घोड़ा महर्षि वाल्मीकि के आश्रम के निकट पहुंचा तो लव कुश ने उस घोड़े को पकड़ लिया तथा अपने आश्रम आकर एक पेड़ के साथ बांध दिया| जब लक्ष्मण सेना लेकर निकट आया तो उसने बालकों को घोड़ा छोड़ने के लिए कहा| लेकिन लव कुश ने मना कर दिया ओर कहा, "हमें यह घोड़ा बहुत पसंद है, हम इसकी सवारी किया करेंगे, आप कोई अन्य घोड़ा छोड़ दीजिए|" लेकिन लक्ष्मण ने उनको समझाया कि 'यह अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा है जो भी इस घोड़े को पकड़ेगा, उसे हमारे साथ युद्ध करना पड़ेगा|" पर बालक आगे से कहने लगे, "हम युद्ध करने को तैयार हैं लेकिन हम घोड़ा नहीं छोड़ेंगे|"

लक्ष्मण ने उनको युद्ध के लिए तैयार होने के लिए कहा| वह बालक भी महर्षि वाल्मीकि जी से युद्ध विद्या का ज्ञान प्राप्त कर चुके थे तथा जो योद्धा ब्रह्मज्ञानी वाल्मीकि से युद्ध विद्या ग्रहण कर चूका हो, वह भला कैसे हार सकता है| इसलिए दोनों बालक तीर कमान लेकर तथा कवच पहन कर घोड़ों पर सवार होकर मैदान में आ गए| लक्ष्मण की सेना के सामने डटकर उन्होंने निर्भीकता से कहा, "यदि आप में हिम्मत है तो हमारे ऊपर हमला करो|"

लक्ष्मण ने एक तीर छोड़ा जिसे लव ने अपने तीर से ही रोक लिया| फिर लव कुश ने तीरों की ऐसी वर्षा की कि लक्ष्मण की सेना वहीं पर ढेर हो गई| लक्ष्मण यह चमत्कार देखकर बड़ा हैरान हुआ, वह फिर बालकों को समझाने लगा| लेकिन लव कुश ने लक्ष्मण को वही मार दिया|

लक्ष्मण की हार के बारे में जब श्री राम चन्द्र जी को पता लगा तो उन्होंने शत्रुघ्न को एक बड़ी फौज देकर रणभूमि में भेजा| लेकिन शत्रुघ्न भी दोनों बालकों का मुकाबला न कर सका तथा पराजित हो गया| उसे भी महर्षि वाल्मीकि के शिष्यों ने धरती पर धूल चटा दी|

शत्रुघ्न की हार का समाचार सुनकर श्री रामचन्द्र जी ने भरत को भेजा| भरत ने पहले आकर लव कुश को बहुत समझाया लेकिन बालकों के ऊपर इसका कोई असर न हुआ| उन्होंने भरत की भी सारी सेना को मार डाला तथा भरत भी मूर्छित होकर गिर पड़ा|

फिर श्री रामचन्द्र भी स्वयं सेना लेकर आए| वह ऐसे शूरवीर बालकों को देख कर बहुत खुश हुए| उन्होंने बालकों की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा उनको घोड़ा छोड़ने के लिए कहा| पर बालकों ने उनकी बात की तरफ कोई ध्यान न दिया तथा युद्ध आरम्भ कर दिया| कुछ ही समय में श्री रामचन्द्र जी की सेना मार फेंकी|

अंत में उन्होंने श्री रामचन्द्र जी को भी घायल कर दिया| पूर्ण तौर पर विजय प्राप्त करके लव-कुश माता सीता को मिलने गए तथा कहा कि उन्होंने भारत के सर्वश्रेष्ठ राजा को पराजित कर दिया है तथा अब सारे देश के मालिक बन गए हैं| जब सीता माता ने यह बात सुनी तो उनको शक हुआ कि इस देश के राजा तो श्री रामचन्द्र जी हैं, इन्होने कहीं अपने पिता जी को ही न पराजित कर दिया हो| वह उसी समय रणभूमि पर उस रजा को देखने गई| जब उन्होंने श्री रामचन्द्र जी को घायल अवस्था में मूर्छित देखा तो ऊंची-ऊंची रोने लग पड़ी और कहा कि तुम दोनों ने मेरा सुहाग मुझ से छीन लिया है| यह बात सुनकर बालक बड़े हैरान हुए| फिर सीता माता ने परमात्मा के आगे प्रार्थना की कि यदि मैं पतिव्रता स्त्री हूं तो प्रभु मेरे सुहाग को जीवन दान दें| महर्षि वाल्मीकि जी को भी सारी बात का पता लग गया| उन्होंने श्री रामचन्द्र जी के मुंह पर पवित्र जल के छींटे मारे तो वह उठ कर बैठ गए| अपने पास दो शूरवीर बालकों, सीता तथा महर्षि वाल्मीकि जी को देख कर बहुत हैरान हुए| महर्षि जी ने फिर उनको सारी बात समझाई| श्री रामचन्द्र जी ने सीता माता का धन्यवाद किया तथा अपने दो शूरवीर पुत्रों को देख कर बहुत खुश हुए| फिर उन्होंने महर्षि वाल्मीकि जी को कहा कि अपनी कृपा दृष्टि से मेरे दूसरे भाईयों और सेना को भी जीवन दान की कृपा करें| सीता माता ने फिर प्रार्थना की तो रामचन्द्र जी के सारे भाई तथा सैनिक जीवित होकर उठ खड़े हुए| फिर श्री रामचन्द्र जी महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में गए तथा सीता ओर बालकों को साथ ले जाने की इच्छा प्रगट की| वाल्मीकि जी ने बड़ी प्रसन्नता के साथ ले जाने की इच्छा प्रगट की| वाल्मीकि जी ने बड़ी प्रसन्नता के साथ सीता माता तथा बालकों को उनके साथ जाने की आज्ञा दे दी| दोनों बालक ओर सीता माता अयोध्या पहुंच गए| जब सारे नगर वासियों को पता लगा तो उन्होंने बहुत खुशियां मनाईं| शूरवीर बालकों को देखने के लिए सारा नगर उमड़ आया|

लव और कुश जिन को राम कथा सम्पूर्ण मौखिक याद थी उन्होंने सारी कथा सुरीली मधुरवाणी में नगर वासियों को सुनाई| श्री रामचन्द्र जी अपनी सारी जीवन कथा सुन कर धन्य हो गए| उन्होंने महर्षि वाल्मीकि कृत इस अमर कथा को सुन कर कहा, "जब तक यह दुनिया रहेगी महर्षि वाल्मीकि जी की यह कथा चलती रहेगी, धन्य हैं महर्षि वाल्मीकि जी, उनकी सदा ही जै होगी|"

वाल्मीकि जी ने बाद में उत्तराकांड लिखा| इस तरह वाल्मीकि जी एक उच्चकोटि के विद्वान तथा शस्त्रधारी शूरवीर थे| उनमें एक अवतार वाले सारे गुण विद्यमान थे| आज अगर संसार श्री रामचन्द्र जी को कहानी को जानता है तो वह केवल महर्षि वाल्मीकि जी की मेहनत के फलस्वरूप| उन्होंने अपने जीवन के कई साल उनकी जीवन गाथा को ब्यान करने में लगा दिए|


Wednesday, November 20, 2013

श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 51



ॐ सांई राम













आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से श्री साईं-वार की हार्दिक शुभ कामनाएं , हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री  साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी से अनुमति चाहते है , हमें आशा है की हमारा यह कदम  घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर हमें सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है...





श्री साई सच्चरित्र - अध्याय 51 - उपसंहार ------------------------------------



अध्याय – 51 पूर्ण हो चुका है और अब अन्तिम अध्याय (मूल ग्रन्थ का 52 वां अध्याय) लिखा जा रहा है और उसी प्रकार सूची लिखने का वचन दिया है, जिस प्रकार की अन्य मराठी धार्मिक काव्यग्रन्थों में विषय की सूची अन्त में लिखी जाती है । अभाग्यवश हेमाडपंत के कागजपत्रों की छानबीन करने पर भी वह सूची प्राप्त न हो सकी । तब बाब के एक योग्य तथा धार्मि भक्त ठाणे के अवकाशप्राप्त मामलतदार श्री. बी. व्ही. देव ने उसे रचकर प्रस्तुत किया । पुस्तक के प्रारम्भ में ही विषयसूची देने तथा प्रत्येक अध्याय में विषय का संकेत शीर्षक स्वरुप लिखना ही आधुनिक प्रथा है, इसलिये यहाँ अनुक्रमाणिका नहीं दी जा रही है । अतः इस अध्याय को उपसंहार समझना ही उपयुक्त होगा । अभाग्यवश हेमा़डपंत उस समय तक जीवित न रहे कि वे अपने लिखे हुए इस अध्याय की प्रति में संशोधन करके उसे छपने योग्य बनाते ।








श्री सदगुरु साई की महानता
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हे साई, मैं आपकी चरण वन्दना कर आपसे शरण की याचना करता हूँ, क्योकि आप ही इस अखिल विश्व के एकमात्र आधार है । यदि ऐसी ही धारणा लेकर हम उनका भजन-पूजन करें तो यह निश्चित है कि हमारी समस्त इच्छाएं शीघ्र ही पूर्ण होंगी और हमें अपने परम लक्ष्य की प्राप्ति हो जायेगी । आज निन्दित विचारों के तट पर माया-मोह के झंझावात से धैर्य रुपी वृक्ष की जड़ें उखड़ गई है । अहंकार रुपी वायु की प्रबलता से हृदय रुपी समुद्र में तूफान उठ खड़ा हुआ है, जिसमें क्रोध और घृणा रुपी घड़ियाल तैरते है और अहंभाव एवं सन्देह रुपी नाना संकल्प-विकल्पों की संतत भँवरों में निन्दा, घृणा और ईर्ष्या रुपी अगणित मछलियाँ विहार कर रही है । यघपि यह समुद्र इतना भयानक है तो भी हमारे सदगुरु साई महाराज उसमें अगस्त्य स्वरुप ही है । इसलिये भक्तों को किंचितमात्र भी भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है । हमारे सदगुरु तो जहाज है और वे हमें कुशलतापूर्वक इस भयानक भव-समुद्र से पार उतार देंगे ।



प्रार्थना
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श्री सच्चिदानंद साई महाराज को साष्टांग नमस्कार करके उनके चरण पकड़ कर हम सब भक्तों के कल्याणार्थ उनसे प्रार्थना करते है कि हे साई । हमारे मन की चंचलता और वासनाओं को दूर करो । हे प्रभु । तुम्हारे श्रीचरणों के अतिरिक्त हममें किसी अन्य वस्तु की लालसा न रहे । तुम्हारा यह चरित्र घर-घर पहुँचे और इसका नित्य पठन-पाठन हो और जो भक्त इसका प्रेमपूर्वक अध्ययन करें, उनके समस्त संकट दूर हो ।







फलश्रुति (अध्ययन का पुरस्कार)
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अब इस पुस्तक के अध्ययन से प्राप्त होने वाले फल के सम्बन्ध में कुछ शब्द लिखूँगा । इस ग्रन्थ के पठन-पठन से मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी । पवित्र गोदावरी नदी में स्नान कर, शिरडी के समाधि मन्दिर में श्री साईबाबा की समाधि के दर्शन कर लेने के पश्चात इस ग्रन्थ का पठन-पाठन या श्रवण प्रारम्भ करोगे तो तुम्हारी तिगुनी आपत्तियाँ भी दूर हो जायेंगी । समय-समय पर श्री साईबाबा की कथा-वार्ता करते रहने से तुम्हें आध्यात्मिक जगत् के प्रति अज्ञात रुप से अभिरुचि हो जायेगी और यदि तुम इस प्रकार नियम तथा प्रेमपूर्वक अभ्यास करते रहे तो तुम्हारे समस्त पाप अवश्य नष्ट हो जायेंगें । यदि सचमुच ही तुम आवागमन से मुक्ति चाहते हो तो तुम्हें साई कथाओं का नित्य पठन-पाठन, स्मरण और उनके चरणों में प्रगाढ़ प्रीति रखनी चाहिये । साई कथारुपी समुद्र का मंथन कर ुसमें से प्राप्त रत्नों का दूसरों को वितरण करो, जिससे तुम्हें नित्य नूतन आनन्द का अनुभव होगा और श्रोतागण अधःपतन से बच जायेंगे । यदि भक्तगण अनन्य भाव से उनकी शरण आयें तो उनका ममत्व नष्ट होकर बाबा से अभिन्नता प्राप्त हो जायेगी, जैसे कि नदी समुद्र में मिल जाती है । यदि तुम तीन अवस्थाओं (अर्थात्- जागृति, स्वप्न और निद्रा) में से किसी एक में भी साई-चिन्तन में लीन हो जाओ तो तुम्हारा सांसारिक चक्र से छुटकारा हो जायेगा । स्नान कर प्रेम और श्रद्घयुक्त होकर जो इस ग्रन्थ का एक सप्ताह में पठन समाप्त करेंगे, उनके सारे कष्ट दूर हो जायेंगे या जो इसका नित्य पठन या श्रवण करेंगे, उन्हें सब भयों से तुरन्त छुटकारा मिल जायेगा । इसके अध्ययन से हर एक को अपनी श्रद्घा और भक्ति के अनुसार फल मिलेगा । परन्तु इन दोनों के अभाव में किसी भी फल की प्राप्ति होना संभव नहीं है । यदि तुम इस ग्रन्थ का आदरपूर्वक पठन करोगे तो श्री साई प्रसन्न होकर तुम्हें अज्ञान और दरिद्रता के पाश से मुक्त कर, ज्ञान, धन और समृद्घि प्रदान करेंगे । यदि एकाग्रचित होकर नित्य एक अध्याय ही पढ़ोगे तो तुम्हें अपरिमित सुख की प्राप्ति होगी । इस ग्रन्थ को अपने घर पर गुरु-पूर्णिमा, गोकुल अष्टमी, रामनवमी, विजयादशमी और दीपावली के दिन अवश्य पढ़ना चाहिये । यदि ध्यानपूर्वक तुम केवल इसी ग्रन्थ का अध्ययन करते रहोगे तो तुम्हें सुख और सन्तोष प्राप्त होगा और सदैव श्री साई चरणारविंदो का स्मरण बना रहेगा और इस प्रकार तुम भवसागर से सहज ही पार हो जाओगे । इसके अध्ययन से रोगियों को स्वास्थ्य, निर्धनों को धन, दुःखित और पीड़ितों को सम्पन्नता मिलेगी तथा मन के समस्त विकार दूर होकर मानसिक शान्ति प्राप्त होगी ।

मेरे प्रिय भक्त और श्रोतागण । आपको प्रणाम करते हुए मेरा आपसे एक विशेष निवेदन है कि जिनकी कथा आपने इतने दिनों और महीनों से सुनी है, उनके कलिमलहारी और मनोहर चरणों को कभी विस्मृत न होने दें । जिस उत्साह, श्रद्गा और लगन के साथ आप इन कथाओं का पठन या श्रवण करेंगे, श्री साईबाबा वैसे ही सेवा करने की बुद्घि हमें प्रदान करेंगे । लेखक और पाठक इस कार्य में परस्पर सहयोग देकर सुखी होवें ।



प्रसाद - याचना
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अन्त में हम इ
स पुस्तक को समाप्त करते हुए सर्वशक्तिमान परमात्मा से निम्नलिखित कृपा या प्रसादयाचना करते है –



हे ईश्वर । पाठकों और भक्तों को श्री साई-चरणों में पूर्ण और अनन्य भक्ति दो । श्री साई का मनोहर स्वरुप ही उनकी आँखों में सदा बसा रहे और वे समस्त प्राणियों में देवाधिदेव साई भगवान् का ही दर्शन करें । एवमस्तु ।




।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।





।। ऊँ श्री साई यशःकाय शिरडीवासिने नमः ।।



आप सभी को शिर्डी के साँई बाबा ग्रुप की ओर से हार्दिक धन्यवाद, हम प्रत्येक साईं-वार के दिन आप के समक्ष बाबा जी की जीवनी पर आधारित श्री साईं सच्चित्र का एक अध्याय प्रस्तुत करने के लिए श्री साईं जी के श्री चरणों में अनुग्रह करते है की वह हमें इसे पुन: आरम्भ (दिनांक 28 नवम्बर 2013 से ) करने हेतु आज्ञा प्रदान करें एवं हम अपने सभी पाठको से इस बात की भी क्षमा चाहते है की यदि अनजाने में हम से कोई भूल हो गयी हो तो बाबा श्री साईं जी हमें क्षमा प्रदान करने की कृपा करें, हम आपका इस सहयोग के लिए हृदय से आभार व्यक्त करते है एवं आपको आश्वासन देते है की अगले साईं-वार से श्री साईं सचरित्र का पुन: प्रसारण किया जायेगा, हमें आशा है की हमारा यह कदम घर घर तक श्री साईं सच्चित्र का सन्देश पंहुचा कर सभी को सुख और शान्ति का अनुभव करवाएगा, किसी भी प्रकार की त्रुटी के लिए हम सर्वप्रथम श्री साईं चरणों में क्षमा याचना करते है... एवं सभी पाठको का एक बार फिर से आभार व्यक्त करते है ...!!






ॐ सांई राम जी  



Tuesday, November 19, 2013

भक्त अंगरा जी




ॐ साँई राम जी








भक्त अंगरा जी 






गुरु ग्रंथ साहिब में एक तुक आती है:


'दुरबा परूरउ अंगरै गुर नानक जसु गाईओ ||'

जिसने ईश्वर कर नाम सिमरन किया है, यदि कोई पुण्य किया है, वह प्रभु भक्त बना ओर ऐसे भक्तों ने सतिगुरु नानक देव जी का यश गान किया है| अंगरा वेद काल के समय भक्त हुआ है| इसने सिमरन करके अथर्ववेद को प्रगट किया| कलयुग ओर अन्य युगों के लिए अंगरा भक्त ने ज्ञान का भंडार दुनिया के आगे प्रस्तुत किया| इस भक्त का सभी यश करते हैं| इस भक्त विद्वान के पिता का नाम उरु तथा माता का नाम आग्नेय था|

भक्त अंगरा एक राज्य का राजा था| इसके मन में इस बात ने घर कर लिया कि सभी प्रभु के जीव हैं ओर यदि किसी जीव को दुःख मिला तो इसके लिए राजा ही जिम्मेवार होगा| राजा को अपनी प्रजा का सदैव ध्यान रखना चाहिए| इन विचारों के कारण अंगरा बच-बच कर सावधानी से राज करता रहा| राज करते हुए उसे कुछ साल बीत गए|

एक दिन नारद मुनि जी घूमते हुए अंगरा की राजधानी में आए| राजा ने नारद मुनि का अपने राजभवन में बड़ा आदर-सत्कार किया| राजा अंगरा ने विनती की कि मुनिवर! राजभवन छोड़कर वन में जाकर तपस्या क्यों न की जाए? राज की जिम्मेदारी में अनेक बातें ऐसी होती हैं कि कुछ भी अनिष्ट होने से राजा उनके फल का भागीदार होता है| उसने कहा कि मैं ताप करके देव लोक का यश करने का इच्छुक हूं|

राजा अंगरा के मन की बात सुनकर नारद मुनि ने उपदेश किया - राजन! आपके ये वचन ठीक हैं| आपका मन राज करने से खुश नहीं है| मन समाधि-ध्यान लगाता है| मनुष्य का मन जैसा चाहे वही करना चाहिए| मन के विपरीत जाकर किए कार्य उत्तम नहीं होते| यह दुःख का कारण बन जाते हैं| जाएं! ईश्वर की भक्ति करें|

देवर्षि नारद के उपदेश को सुनकर अंगरा का मन ओर भी उदास हो गया| उसने राज-पाठ त्याग कर अपने भाई को राज सिंघासन पर बैठा दिया तथा प्रजा की आज्ञा लेकर वह वनों में चला गया| अंगरा ने वन में जाकर कठोर तपस्या की| भक्ति करने से ऐसा ज्ञान हुआ कि उसके मन में संस्कृत की कविता रचने की उमंग जागी| उसने वेद पर स्मृति की रचना की| 17वीं स्मृति आपकी रची गई है|

अन्त काल आया| कहते हैं कि जब प्राण त्यागे तो ईश्वर ने देवताओं को आपके स्वागत के लिए भेजा| आप भक्ति वाले वरिष्ठ भक्त हुए| जिनका नाम आज भी सम्मानपूर्वक लिया जाता है| परमात्मा की भक्ति करने वाले सदा अमर हैं|
बोलो! सतिनाम श्री वाहिगुरू|


Monday, November 18, 2013

भक्त अम्ब्रीक जी



ॐ साँई राम जी










भक्त अम्ब्रीक जी





अंबरीक मुहि वरत है राति पई दुरबासा आइआ|


भीड़ा ओस उपारना उह उठ नहावण नदी सिधाइआ|


चरणोदक लै पोखिआ ओह सराप देण नो धाइआ|


चक्र सुदरशन काल रूप होई भिहांवल गरब गवाइआ|


ब्राहमण भंना जीउ लै रख न हंघन देव सबाइआ|


इन्द्र लोक शिव लोक तज ब्रहम लोक बैकुंठ तजाइआ|


देवतिआं भगवान सण सिख देई सभना समझाइआ|


आई पइआ सरणागती मरीदा अंबरीक छुडाइआ|


भगत वछलु जग बिरद सदाइआ|४|




हे भगत जनो! भाई गुरदास जी के कथन अनुसार अम्ब्रीक भी एक महान भक्त हुआ है| इनकी महिमा भी भक्तों में बेअंत है| आप को दुरबाशा ऋषि श्राप देने लगे थे लेकिन स्वयं ही दुरबाशा ऋषि राजा अम्ब्रीक के चरणों में गिर गए| ऐसा था वह भक्त|

भक्त अम्ब्रीक पहले दक्षिण भारत का राजा था और वासुदेव अथवा श्री कृष्ण भक्त था| यह माया में उदासी भक्त था| इनके पिता का नाम भाग था| वह भी राजा था| जब यह युवा हुआ तो राजसिंघासन पर आसीन हुआ| राजा साधू-संतों की अत्यंत सेवा किया करता था और आए गए जरूरत मंदों की सहायता करता था|

राजा अम्ब्रीक में बहुत सारे गुण विद्यमान थे| वह अपनी सारी इन्द्रियों को वश में रखता था| वह प्रत्येक व्यक्ति को एक आंख से ही देखता और हर निर्धन, धनी, सन्त और भिक्षुक का ध्यान रखता| बुद्धि से सोच-विचार कर जरूरत मंदों की सेवा करता जितनी उनको आवश्यकता होती| वह भंडारा करके अपने हाथों से प्रसाद श्रद्धालुओं में बांटता| वह प्रतिदिन राम का सिमरन करता तथा नंगे पांव चलकर तीर्थ यात्रा के लिए जाता और कानों से सत्संग का उपदेश सुनता|

राजा अम्ब्रीक ऐसा त्यागी हो गया कि वह राज भवन, कोष, रानियां, घोड़े-हाथी किसी वस्तु पर अपना अधिकार नहीं समझता था| वह सब वस्तुएं प्रजा एवं परमात्मा की मानता था| एकादशी के व्रत रखता एवं पाठ-पूजा में सदा मग्न रहता| इस तरह राजा अम्ब्रीक को जीवन व्यतीत करते हुए कई वर्ष बीत गए|

एक वर्ष श्री कृष्ण जी की भक्ति की प्रेम मस्ती तथा श्रद्धा भावना में लीन होकर उसने प्रतिज्ञा की कि वह हर वर्ष एकादशियां रखेगा| तीन दिन निर्जला व्रत और मथुरा-वृंदावन में जाकर यज्ञ करके दान पुण्य भी देगा| उसने ऐसी प्रतिज्ञा कर ली| अम्ब्रीक एक आशावादी राजा था| उसने भरोसे में सभी बातें पूरी कर लीं और मंत्रियों सहित मथुरा-वृंदावन में पहुंच गया| मथुरा और वृंदावन में उसने यमुना स्नान करके यज्ञ लगाया| ब्राह्मणों को उपहार एवं दान दिया| वस्त्र तथा अन्न के अलावा सोने के सींगों वाली गऊएं भेंट में दान कीं| कई स्थानों पर पुराणों में लिखा है कि राजा अम्ब्रीक ने करोड़ों गाएं दान कीं| अर्थात् ढ़ेर सारा दान पुण्य किया|

ऐसा समय आ गया कि ब्राहमण छत्तीस प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन खा कर तथा दान-दक्षिणा लेकर कृतार्थ होकर घर को विदा हो गए तो राजा को आज्ञा मिली कि वह अपना व्रत खोल ले| जब राजा ने अपना व्रत खोला तो वह खुशी-खुशी इच्छा पूर्ण होने पर स्वयं ही राजभवन को चल पड़ा|

राजा राज भवन में अभी पहुंचा भी नहीं था कि उसे मार्ग में दुरबाशा ऋषि आ मिले| राजा ने उन्हें झुककर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनती की|

'हे शिरोमणि मुनिवर! क्या आप राजभवन में भोजन करेंगे| यज्ञ का भोजन लेकर तृप्त होकर निर्धन राजा अम्ब्रीक को कृतार्थ करें|'

'जैसी राजन की इच्छा! भोजन का निमंत्रण स्वीकार करता हूं लेकिन यमुना में स्नान करने के बाद|'

ऋषि दुरबाशा ने उत्तर दिया|

यह कहकर ऋषि चल पड़ा| उसने मन में अनित्य धारण किया था| वह दरअसल राजा अम्ब्रीक को मोह-माया के जाल में फंसाने हेतु आया था| वैसे भी दुरबाशा ऋषि मन का क्रोधी एवं छोटी-छोटी बातों पर श्राप दे दिया करता था| इसके श्राप देने से कितनों को ही नुक्सान पहुंचा, वह बड़े प्रसिद्ध थे|

निमंत्रण देकर प्रसन्नचित राजा अम्ब्रीक अपने राजमहल में चला आया और ऋषि दुरबाशा का इंतजार करने लग गया| द्वाद्वशी का समय भी बीतने के निकट था लेकिन ऋषि दुरबाशा न आया| पंडितों ने आग्रह किया कि राजन! आप व्रत खोल ले लेकिन अम्ब्रीक यही उत्तर देता रहा-'नहीं'! एक अतिथि के भूखे रहने से पहले मेरा व्रत खोलना ठीक नहीं|

ऋषि दुरबाशा पूजा-पाठ में लीन हो गया| वह जान-बूझकर ही देर तक न पहुंचा| जब ऋषि न आया तो ब्राह्मणों ने चरणामृत पीला कर व्रत खुलवा दिया और कहा कि चरणामृत अन्न नहीं|

ऋषि दुरबाशा समय पाकर राजा अम्ब्रीक के राज भवन में उपस्थित हुआ| उसने योग विद्या से अनुभव कर लिया कि राजा अम्ब्रीक ने व्रत खोल लिया है| उसे गुस्से करने का बहाना मिला गया| ऋषि दुरबाशा ने अम्ब्रीक को अपशब्द बोलने शुरू कर दिए| उसने कहा कि एक अतिथि को भोजन पान करवाए बिना आपने व्रत खोल कर शास्त्र मर्यादा का उल्लंघन किया है| आपको क्षमा नहीं किया जाएगा|

ऋषि दुरबाशा ने आग बबूला होकर कहा-चण्डाल! अधर्मी! मैं तुम्हें श्राप देकर भस्म कर दूंगा| महांमुनि क्रोध में आकर बुरा-भला कहता गया|

राजा अम्ब्रीक उनकी चुपचाप सुनता रहा| उसने उनकी किसी बात का बुरा नहीं मनाया और खामोश खड़ा रहा| राजा का हौंसला देखकर ऋषि का मन डोल गया लेकिन क्रोध वश होकर उसने कोई बात न की| जब दुरबाशा ऋषि अपशब्द कहकर शांत हुए तो राजा अम्ब्रीक ने हाथ जोड़कर विनती की-हे महामुनि जी! जैसे पूजनीय ब्राह्मणों ने आज्ञा की, वैसे ही मैंने व्रत खोला| आपकी हम राह देखते रहे| उधर से तिथि बीत रही थी| अगर भूल गई है तो भक्त को क्षमा करें| जीव भूल कर बैठता है| आप तो महा कृपालु धैर्यवान मुनि हैं| दया करें! कृपा करें! कुछ जीवन को रोशनी प्रदान करें| मैं श्राप लेने जीवन में नहीं आया| जीव कल्याण की इच्छा पूर्ण करने के लिए पूजा की है|

लेकिन इन बातों से ऋषि दुरबाशा का क्रोध शांत न हुआ| वह और तेज हो गया जैसे वह धर्मी राजा को तबाह करने के इरादा से ही आया हो| उसने अपने क्रोध को और चमकाया तथा क्रोध में आकर दुरबाशा ने अपने बालों की एक लट उखाड़ी| उस लट को जोर से हाथों में मलकर योग बल द्वारा एक भयानक चुड़ैल पैदा की और उसके हाथ में एक तलवार थमा दी जो बिजली की तरह चमक रही थी|

उस चुड़ैल को देखकर ब्राह्मण, माननीय लोग और राजभवन के सारे व्यक्ति डर गए| अधिकतर ने अपनी आंखें बंद कर लीं लेकिन धर्मनिष्ठ और भक्ति भाव वाला राजा अम्ब्रीक न डगमगाया और न ही डरा, वह शांत ही खड़ा रहा|

जैसे ही चुड़ैल धर्मनिष्ठ राजा अम्ब्रीक पर हमला करने लगी तो राजा के द्वार के आगे जो भगवान का सुदर्शन चक्र था, वह घूमने लगा| उसने पहले चुड़ैल का बाजू काट दिया और उसके बाद उसका सिर काट कर उसका वध कर दिया| वह चक्र फिर दुरभाशा ऋषि की तरफ हो गया| आगे-आगे दुरभाशा ऋषि तथा पीछे-पीछे सुदर्शन चक्र, दोनों देव लोक में जा पहुंचे लेकिन फिर भी शांति न आई| देवराज इन्द्र भी ऋषि की रक्षा न कर सका|

दुरबाशा बहुत अहंकारी ऋषि था| वह सदा साधू-संतों, भक्त जनों और अबला देवियों को क्रोध में आकर श्राप देता रहता था| उसने शकुंतला जैसी देवी को भी श्राप देकर अत्यंत दुखी किया था| इसलिए ईश्वर ने उसके अहंकार को तोड़ने के लिए ऐसी लीला रची|

भयभीत दुरबाशा ऋषि को देवताओं ने समझाया कि राजा अम्ब्रीक के अलावा आपका किसी ने कल्याण नहीं करना और आप मारे जाएंगे| परमात्मा उसके अहंकार को शांत करने के लिए ही यह यत्न कर रहा था| उसने तप किया, पर तप करने से वह अहंकारी हो गया|

दुरबाशा परलोक और देवलोक से फिर दौड़ पड़ा| वह पुन: राजा अम्ब्रीक की नगरी में आया और अम्ब्रीक के पांव पकड़ लिए| उसने मिन्नतें की कि हे भगवान रूप राजा अम्ब्रीक! मुझे बचाएं! मैं आगे से किसी साधू-संत को परेशान नहीं करुंगा| दया करें! मेरी भूल माफ करें!

जब दुरबाशा ऋषि ने ऐसी मिन्नतें की तो राजा अम्ब्रीक को उस पर दया आ गई| उसने दुरबाशा की दयनीय दशा देखी तो वह आंसू बह रहा था| राजा को उसकी दशा पर तरस आ गया| राजा अम्ब्रीक ने हाथ जोड़कर ईश्वर का सिमरन किया| प्रभु! दया करें, प्रत्येक प्राणी भूल करता रहता है| उसकी भूलों को माफ करना आपका ही धर्म है| हे दाता! आप कृपा करें! मेहर करें! राजा अम्ब्रीक ने ऐसी विनती करके जब सुदर्शन चक्र की तरफ संकेत किया तो वह अपने स्थान पर स्थिर हो गया| दुरबाशा के प्राणों में प्राण आए| सात सागरों का जल पीने वाला दुरबाशा ऋषि धैर्यवान राजा अम्ब्रीक से पराजित हो गया| उससे क्षमा मांगकर वह अपने राह चल दिया| इस प्रकार राजा अम्ब्रीक जो बड़ा प्रतापी था, संसार में यश कमा कर गया तथा भवजल से पार होकर प्रभु चरणों में लिवलीन होकर उनका स्वरूप हो गया| कोई भेदभाव नहीं रहा| भाई गुरदास जी के वचनों के अनुसार भक्त के ऊपर परमात्मा ने कृपा की जिससे भक्त अम्ब्रीक ने संसार से मोक्ष प्राप्त किया|




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